चल-चित्र: नयी उमर की नयी फसल
स्वर: मोहम्मद रफी
संगीत: रोशन
शब्द: नीरज
स्वपन झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े खड़े बहार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे।
नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गयी,
पाँव जब तलक उठे कि जिंदगी फिसल गयी,
पात पात झड़ गए कि शाख शाख जल गयी,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गयी,
गीत अश्क बन गए, स्वप्न हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिए धुंवा पहन पहन गए,
और हम झुके झुके, मोड़ पर रुके रुके,
उम्र के चढाव का उतार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
क्या शबाब था कि फूल फूल प्यार कर उठा,
क्या कमाल था कि देख आइना निहर उठा,
इस तरफ़ ज़मीन और आस्मां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ , ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गए कली कली कि घुट गयी गली गली
और हम लुटे लुटे, वक्त से पिटे पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार लूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ के स्वर्ग भूमि पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर, शाम बन गयी सहर,
वो उठी लहर के ढह गए किले बिखर बिखर,
और हम डरे डरे, नीर नैन में भरे,
ओढ़ कर कफ़न पड़े मजार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे।
मांग भर चली कि एक जब नयी नयी किरण
ढोलकें धुनक उठीं ठुमक उठे चरण चरण,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पडा, बहक उठे नयन नयन,
पर तभी ज़हर भरी गाज एक वह गिरी,
पूंछ गया सिन्दूर तार तार हुयी चुनरी,
और हम अजान से, दूर के मकान से,
पालकी लिए हुए कहार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
स्वपन झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े खड़े बहार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे।
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