Thursday, May 21, 2009

सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया

करते रहे फिजा से हम सौदा बहार का,
बदला दिया तो क्या ये दिया उनके प्यार का।
सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया,
दिन में अगर चराग जलाये तो क्या किया।

हम बदनसीब प्यार की रुसवाई बन गए
ख़ुद ही लगा के आग तमाशाई बन गए
दामन से अब ये शोले बुझाये तो क्या किया
दिन में अगर चराग जलाये तो क्या किया।

ले ले के हार फूलों की आयी थी बहार
नज़ारे उठा के हमने ने देखा एक बार
आँखों से अब ये परदे हटाये तो क्या किया
दिन में अगर चराग जल्काए तो क्या किया।
सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया।
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मेरी याद में तुम न आंसू बहाना
न जी को जलाना मुझे भूल जाना
समझना था वो एक सपना सुहाना
वो गुजरा ज़माना मुझे भूल जाना।

जुदा मेरी मंजिल जुदा तेरी राहें,
मिलेंगी न अब तेरी मेरी निगाहें,
मुझे तेरी दुनिया से है दूर जाना,
न जी को जलाना मुझे भूल जाना।
समझना था वो एक सपना सुहाना,
वो गुजरा ज़माना मुझे भूल जाना।

ये रो रो के कहता है टुटा हुआ दिल,
नही हूँ मैं तेरी मुहब्बत के काबिल,
मेरा नाम तक अपने लुब पे न लाना।
समझना था वो एक सपना सुहाना,
वो गुजरा ज़माना मुझे भूल जाना।

मेरी याद में तुम न आंसू बहाना,
न जी को जलाना मुझे भूल जाना।

Saturday, February 28, 2009

ऐ जिंदगी गले लगा ले

चल-चित्र : सदमा
स्वर: सुरेश वाडेकर
संगीत: इल्या राजा
शब्द:

ऐ जिंदगी गले लगा ले,
हमने भी तेरे हर इक गम को गले से लगाया है, है न ?
हमने बहाने से छुप के ज़माने से
पलकों के परदे में घर भर लिया,
तेरा सहारा मिल गया है जिंदगी,
ऐ जिंदगी गले लगा ले...
छोटा सा साया था,
आँखो में आया
था,
हमने तो बूंदों से मन भर लिया,
हमको किनारा मिल गया है जिंदगी,
ऐ जिंदगी गले से लगा ले तू...

Sunday, December 21, 2008

चल-चित्र: नीलकमल
स्वर: मोहम्मद रफी
संगीत: नौशाद
शब्द: साहिर लुधियानवी

कोई सागर दिल को बहलाता नहीं,
बेखुदी में भी करार आता नहीं।

मैं कोई पत्थर नहीं इन्सान हूँ,
कैसे कह दूँ गम से घबराता नहीं,
कोई सागर दिल को बहलाता नहीं,
बेखुदी में भी करार आता नहीं।

कल तो सब थे कारवां के साथ साथ,
आज कोई राह दिखलाता नहीं,
कोई सागर दिल को बहलाता नहीं,
बेखुदी में भी करार आता नहीं।

ज़िन्दगी के आईने को तोड़ दो,
इसमे अब कुछ भी नज़र आता नहीं,
कोई सागर दिल को बहलाता नहीं,
बेखुदी में भी करार आता नहीं।

चल-चित्र: हम दोनों
स्वर: मोहम्मद रफी
संगीत: रोशन
शब्द: साहिर लुधियानवी

कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया।
बात निकली तो हरेक बात पे रोना आया।
हम तो समझे थे की हम भूल गए हैं उनको,
क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया,
कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया।
किस लिए जीते हैं हम, किस के लिए जीते हैं,
वराहात ऐसे सवालात पे रोना आया,
कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया।
कौन रोता है किसी और के खातिर ऐ दोस्त,
सबको अपनी ही किसी बात पे रोना आया।
कभी ख़ुद पर कभी हालत पे रोना आया।

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मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया
हर फ़िक्र को धुवें में उडाता चला गया,
बरबादियों का शोक मानना फिजूल था,
बरबादियों का जश्न मनाता चला गया।
हर फ़िक्र को धुवें में उडाता चला गया।
जो मिल गया उसको मुकद्दर समझ लिया,
जो खो गया उसको मैं भुलाता चला गया,
गम और खुशी में फर्क न महसूस हो जहाँ,
मैं दिल को उस मुकाम पे लता चला गया,
मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया,
हर फिक्र को धुवें में उडाता चला गया।

चल-चित्र: चित्रलेखा (१९६४)
स्वर: मोहम्मद रफी
संगीत: रोशन
शब्द: साहिर लुधियानवी

मन रे तू काहे न धीर धरे,
वो निर्मोही, मोह न जाने जिनका मोह करे,
मन रे तू काहे न धीर धरे।
इस जीवन की चढ़ती ढलती
धुप को किसने बाँधा,
रंग पे किसने पहरे डाले,
रूप को किसने बाँधा,
काहे ये जतन करे,
मन रे तू काहे न धीर धरे।
उतना ही उपकार समझ कोई,
जितना साथ निभा दे,
जनम मरण का मेल है सपना,
ये सपना बिसरा दे,
कोई न संग मरे,
मन रे तू काहे न धीर धरे,
वो निर्मोही मोह न जाने जिनका मोह करे।
मन रे तू काहे न धीर धरे।

चल-चित्र: नयी उमर की नयी फसल
स्वर: मोहम्मद रफी
संगीत: रोशन
शब्द: नीरज

स्वपन झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े खड़े बहार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे।

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गयी,
पाँव जब तलक उठे कि जिंदगी फिसल गयी,
पात पात झड़ गए कि शाख शाख जल गयी,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गयी,
गीत अश्क बन गए, स्वप्न हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिए धुंवा पहन पहन गए,
और हम झुके झुके, मोड़ पर रुके रुके,
उम्र के चढाव का उतार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल फूल प्यार कर उठा,
क्या कमाल था कि देख आइना निहर उठा,
इस तरफ़ ज़मीन और आस्मां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ , ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गए कली कली कि घुट गयी गली गली
और हम लुटे लुटे, वक्त से पिटे पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार लूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ के स्वर्ग भूमि पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर, शाम बन गयी सहर,
वो उठी लहर के ढह गए किले बिखर बिखर,
और हम डरे डरे, नीर नैन में भरे,
ओढ़ कर कफ़न पड़े मजार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे।

मांग भर चली कि एक जब नयी नयी किरण
ढोलकें धुनक उठीं ठुमक उठे चरण चरण,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पडा, बहक उठे नयन नयन,
पर तभी ज़हर भरी गाज एक वह गिरी,
पूंछ गया सिन्दूर तार तार हुयी चुनरी,
और हम अजान से, दूर के मकान से,
पालकी लिए हुए कहार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

स्वपन झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े खड़े बहार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे।

चल-चित्र: रोग
स्वर: के के
संगीत: एम एम क्रीम
शब्द: नीलेश मिश्रा

तेरे इस जहाँ में ऐ खुदा वो नहीं तो लगता है कुछ नहीं
नहीं हो के भी वो हर जगह करूँ क्यूँ यकीन की वो अब नहीं,
तेरे इस जहाँ में ऐ खुदा वो नहीं तो लगता है कुछ नहीं है

है उदास तेरे बिना शहर, तुझे याद करते हैं रास्ते,
है वो लोग अपने घरों में बंद, जो निकलते थे तेरे वास्ते,
बहारें जवानी कहाँ गयी, थी अभी खिजां की रुत नहीं,
तेरे इस जहाँ में ऐ खुदा वो नहीं तो लगता है कुछ नहीं।

सब जीते हैं यहाँ जिंदगी, तुझे जिंदगी ने जिया मगर,
था वो रब भी तनहा तेरे बिना , तू बना लिया तुझे हमसफ़र,
तुझे छीन ल खुदा से मैं, कोई उस का तुझ पे तो हक नहीं,
तेरे इस जहाँ में ऐ खुदा वो नहीं तो लगता है कुछ नहीं।