चल-चित्र: नीलकमल
स्वर: मोहम्मद रफी
संगीत: नौशाद
शब्द: साहिर लुधियानवी
कोई सागर दिल को बहलाता नहीं,
बेखुदी में भी करार आता नहीं।
मैं कोई पत्थर नहीं इन्सान हूँ,
कैसे कह दूँ गम से घबराता नहीं,
कोई सागर दिल को बहलाता नहीं,
बेखुदी में भी करार आता नहीं।
कल तो सब थे कारवां के साथ साथ,
आज कोई राह दिखलाता नहीं,
कोई सागर दिल को बहलाता नहीं,
बेखुदी में भी करार आता नहीं।
ज़िन्दगी के आईने को तोड़ दो,
इसमे अब कुछ भी नज़र आता नहीं,
कोई सागर दिल को बहलाता नहीं,
बेखुदी में भी करार आता नहीं।
No comments:
Post a Comment