चल-चित्र: हम दोनों
स्वर: मोहम्मद रफी
संगीत: रोशन
शब्द: साहिर लुधियानवी
कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया।
बात निकली तो हरेक बात पे रोना आया।
हम तो समझे थे की हम भूल गए हैं उनको,
क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया,
कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया।
किस लिए जीते हैं हम, किस के लिए जीते हैं,
वराहात ऐसे सवालात पे रोना आया,
कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया।
कौन रोता है किसी और के खातिर ऐ दोस्त,
सबको अपनी ही किसी बात पे रोना आया।
कभी ख़ुद पर कभी हालत पे रोना आया।
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मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया
हर फ़िक्र को धुवें में उडाता चला गया,
बरबादियों का शोक मानना फिजूल था,
बरबादियों का जश्न मनाता चला गया।
हर फ़िक्र को धुवें में उडाता चला गया।
जो मिल गया उसको मुकद्दर समझ लिया,
जो खो गया उसको मैं भुलाता चला गया,
गम और खुशी में फर्क न महसूस हो जहाँ,
मैं दिल को उस मुकाम पे लता चला गया,
मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया,
हर फिक्र को धुवें में उडाता चला गया।
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