Saturday, December 20, 2008

चल चित्र : रजनीगंधा (१९७४)
स्वर : मुकेश
संगीत : सलील चौधरी
शब्द : योगेश गौड़

कई बार यूँ भी देखा है,
ये जो मन की सीमा रेखा है,
मन तोड़ने लगता है,
अनजानी प्यास के पीछे ,
अनजानी आस के पीछे ,
मन दौड़ने लगता है,
कई बार यूँ भी देखा है...
राहों में , राहों में, जीवन की राहों में,
जो खिले हैं फूल फूल मुस्करा के ,
कौन सा फूल चुराके ,
रख लूँ मन में सजा के,
कई बार यूँ भी देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है, मन तोड़ने लगता है,
जानूँ ना , जानूँ ना, उलझन ये जानूँ ना ,
सुलझाऊँ कैसे कुछ समझ ना पाऊं ,
किसको मीत बनाऊं ,
किसकी प्रीत भुलाऊँ ,
कई बार यूँ भी देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है, मन तोड़ने लगता है।

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