Sunday, December 21, 2008

चल-चित्र: नीलकमल
स्वर: मोहम्मद रफी
संगीत: नौशाद
शब्द: साहिर लुधियानवी

कोई सागर दिल को बहलाता नहीं,
बेखुदी में भी करार आता नहीं।

मैं कोई पत्थर नहीं इन्सान हूँ,
कैसे कह दूँ गम से घबराता नहीं,
कोई सागर दिल को बहलाता नहीं,
बेखुदी में भी करार आता नहीं।

कल तो सब थे कारवां के साथ साथ,
आज कोई राह दिखलाता नहीं,
कोई सागर दिल को बहलाता नहीं,
बेखुदी में भी करार आता नहीं।

ज़िन्दगी के आईने को तोड़ दो,
इसमे अब कुछ भी नज़र आता नहीं,
कोई सागर दिल को बहलाता नहीं,
बेखुदी में भी करार आता नहीं।

चल-चित्र: हम दोनों
स्वर: मोहम्मद रफी
संगीत: रोशन
शब्द: साहिर लुधियानवी

कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया।
बात निकली तो हरेक बात पे रोना आया।
हम तो समझे थे की हम भूल गए हैं उनको,
क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया,
कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया।
किस लिए जीते हैं हम, किस के लिए जीते हैं,
वराहात ऐसे सवालात पे रोना आया,
कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया।
कौन रोता है किसी और के खातिर ऐ दोस्त,
सबको अपनी ही किसी बात पे रोना आया।
कभी ख़ुद पर कभी हालत पे रोना आया।

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मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया
हर फ़िक्र को धुवें में उडाता चला गया,
बरबादियों का शोक मानना फिजूल था,
बरबादियों का जश्न मनाता चला गया।
हर फ़िक्र को धुवें में उडाता चला गया।
जो मिल गया उसको मुकद्दर समझ लिया,
जो खो गया उसको मैं भुलाता चला गया,
गम और खुशी में फर्क न महसूस हो जहाँ,
मैं दिल को उस मुकाम पे लता चला गया,
मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया,
हर फिक्र को धुवें में उडाता चला गया।

चल-चित्र: चित्रलेखा (१९६४)
स्वर: मोहम्मद रफी
संगीत: रोशन
शब्द: साहिर लुधियानवी

मन रे तू काहे न धीर धरे,
वो निर्मोही, मोह न जाने जिनका मोह करे,
मन रे तू काहे न धीर धरे।
इस जीवन की चढ़ती ढलती
धुप को किसने बाँधा,
रंग पे किसने पहरे डाले,
रूप को किसने बाँधा,
काहे ये जतन करे,
मन रे तू काहे न धीर धरे।
उतना ही उपकार समझ कोई,
जितना साथ निभा दे,
जनम मरण का मेल है सपना,
ये सपना बिसरा दे,
कोई न संग मरे,
मन रे तू काहे न धीर धरे,
वो निर्मोही मोह न जाने जिनका मोह करे।
मन रे तू काहे न धीर धरे।

चल-चित्र: नयी उमर की नयी फसल
स्वर: मोहम्मद रफी
संगीत: रोशन
शब्द: नीरज

स्वपन झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े खड़े बहार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे।

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गयी,
पाँव जब तलक उठे कि जिंदगी फिसल गयी,
पात पात झड़ गए कि शाख शाख जल गयी,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गयी,
गीत अश्क बन गए, स्वप्न हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिए धुंवा पहन पहन गए,
और हम झुके झुके, मोड़ पर रुके रुके,
उम्र के चढाव का उतार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल फूल प्यार कर उठा,
क्या कमाल था कि देख आइना निहर उठा,
इस तरफ़ ज़मीन और आस्मां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ , ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गए कली कली कि घुट गयी गली गली
और हम लुटे लुटे, वक्त से पिटे पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार लूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ के स्वर्ग भूमि पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर, शाम बन गयी सहर,
वो उठी लहर के ढह गए किले बिखर बिखर,
और हम डरे डरे, नीर नैन में भरे,
ओढ़ कर कफ़न पड़े मजार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे।

मांग भर चली कि एक जब नयी नयी किरण
ढोलकें धुनक उठीं ठुमक उठे चरण चरण,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पडा, बहक उठे नयन नयन,
पर तभी ज़हर भरी गाज एक वह गिरी,
पूंछ गया सिन्दूर तार तार हुयी चुनरी,
और हम अजान से, दूर के मकान से,
पालकी लिए हुए कहार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

स्वपन झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े खड़े बहार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे।

चल-चित्र: रोग
स्वर: के के
संगीत: एम एम क्रीम
शब्द: नीलेश मिश्रा

तेरे इस जहाँ में ऐ खुदा वो नहीं तो लगता है कुछ नहीं
नहीं हो के भी वो हर जगह करूँ क्यूँ यकीन की वो अब नहीं,
तेरे इस जहाँ में ऐ खुदा वो नहीं तो लगता है कुछ नहीं है

है उदास तेरे बिना शहर, तुझे याद करते हैं रास्ते,
है वो लोग अपने घरों में बंद, जो निकलते थे तेरे वास्ते,
बहारें जवानी कहाँ गयी, थी अभी खिजां की रुत नहीं,
तेरे इस जहाँ में ऐ खुदा वो नहीं तो लगता है कुछ नहीं।

सब जीते हैं यहाँ जिंदगी, तुझे जिंदगी ने जिया मगर,
था वो रब भी तनहा तेरे बिना , तू बना लिया तुझे हमसफ़र,
तुझे छीन ल खुदा से मैं, कोई उस का तुझ पे तो हक नहीं,
तेरे इस जहाँ में ऐ खुदा वो नहीं तो लगता है कुछ नहीं।

चल-चित्र: रोग
स्वर: के के
संगीत: एम एम क्रीम
शब्द: नीलेश मिश्रा , सैयद कादरी

मैंने दिल से कहा ढूंढ लाना खुशी, नासमझ लाया गम तो ये गम ही सही।
बेचारा कहाँ जानता है, खलिश है या क्या खला है,
शहर भर की खुशी से, ये दर्द मेरा भला है,
जश्न ये रास न आए, मजा तो बस गम में आया है।
मैंने दिल से कहा ढूंढ लाना खुशी, नासमझ लाया गम तो ये गम ही सही।
कभी है इश्क का उजाला, कभी है मौत का अँधेरा
बताओ कौन भेस होगा, मैं जोगी बनूँ या लुटेरा,
कई चेहरे हैं इस दिल के न जाने कौन सा मेरा,
मैंने दिल से कहा ढूंढ लाना खुशी, नासमझ लाया गम तो ये गम ही सही।
हजारों ऐसे फासले थे जो तय करने चले थे,
राहें मगर चल पडी थी और पीछे हम रह गए थे,
कदम दो चार चल पाये किए फेरे तेरे मन के,
मैंने दिल से कहा ढूंढ लाना खुशी, नासमझ लाया गम तो ये गम ही सही।

खुला है इस रात में जो, बहकता नूर उसका,

कभी वो एक चेहरा बन के , अगर हो जाए अपना,

ये ही मेरी हकीकत है, मगर अब तक तो है एक सपना,

मैंने दिल से कहा ढूंढ लाना खुशी, नासमझ लाया गम तो ये गम ही सही।

Saturday, December 20, 2008

चल-चित्र: आनंद
स्वर: मुकेश
संगीत: सलील चौधरी
शब्द: योगेश गौड़

कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
सांझ की दुल्हन बदन चुराए चुपके से आए,
मेरे ख्यालों के आँगन में दीप जलाये,
कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए चुपके से आए।

कहीं तो ये दिल कभी मिल नही पाते,
कहीं पे निकल आए जन्मों के नाते,
घनी थी उलझन, प्यासा अपना मन,
अपना ही हो के सहे दर्द पराये।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए चुपके से आए।

दिल जाने मेरे सारे भेद ये गहरे,
हो गए कैसे मेरे सपने सुनहरे,
ये मेरे सपने ये ही तो हैं अपने,
मुझसे न जुदा होंगे इनके ये साये।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए चुपके से आए।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए।

कहीं तो ये दिल कभी मिल नही पाते,
कहीं पे निकल आए जन्मों के नाते,
घनी थी उलझन, प्यासा अपना मन,
अपना ही हो के सहे दर्द पराये।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए चुपके से आए।

दिल जाने मेरे सारे भेद ये गहरे,
हो गए कैसे मेरे सपने सुनहरे,
ये मेरे सपने ये तो ही हैं अपने,
मुझसे न जुदा होंगे इनके ये साये।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए चुपके से आए।

चल-चित्र: आनंद
स्वर: मन्ना डे
संगीत: सलील चौधरी
शब्द: योगेश गौड़


जिंदगी कैसी है पहेली हाय ,
कभी तो हंसाये,
कभी ये रुलाये।

कभी देखो मन नही जागे,
पीछे पीछे सपनों के भागे,
एक दिन सपनों का राही,
चला जाए सपनों से आगे कहाँ?
जिंदगी कैसी है पहेली हाय ,
कभी तो हंसाये, कभी ये रुलाये।

जिन्होंने सजाये यहाँ मेले,
सुख दुःख संग संग झेले,
वही चुन कर खामोशी,
यूँ चले जाए अकेले कहाँ?
जिंदगी कैसी है पहेली हाय ,
कभी तो हंसाये,
कभी ये रुलाये।

चल चित्र: छोटी सी बात (१९७५)
स्वर: मुकेश
संगीत: सलील चौधरी
शब्द: योगेश गौड़
ये दिन क्या आए लगे फूल हंसने,
देखो बसंती बसंती होने लगे मेरे सपने,
ये दिन क्या आए लगे फूल हंसने।
सोने जैसी हो रही हैं हर सुबह मेरी,
लगे हर सांझ अब गुलाल से भरी,
चलने लगी महकी हुयी,
पवन मगन झूम के,
आँचल तेरा चूम के,
ये दिन क्या आए लगे फूल हंसने।
वहाँ मन बावरा आज उड़ चला,
जहाँ पर हैं गगन सलोना सांवला,
जाके वहीं रख दे कहीं,
मन रंगों में खोल के,
सपने ये अनमोल से,
ये दिन क्या आए लगे फूल हंसने,
देखो बसंती बसंती,
होने लगे मेरे सपने,
ये दिन क्या आए लगे फूल हंसने।

चल चित्र : रजनीगंधा (१९७४)
स्वर : मुकेश
संगीत : सलील चौधरी
शब्द : योगेश गौड़

कई बार यूँ भी देखा है,
ये जो मन की सीमा रेखा है,
मन तोड़ने लगता है,
अनजानी प्यास के पीछे ,
अनजानी आस के पीछे ,
मन दौड़ने लगता है,
कई बार यूँ भी देखा है...
राहों में , राहों में, जीवन की राहों में,
जो खिले हैं फूल फूल मुस्करा के ,
कौन सा फूल चुराके ,
रख लूँ मन में सजा के,
कई बार यूँ भी देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है, मन तोड़ने लगता है,
जानूँ ना , जानूँ ना, उलझन ये जानूँ ना ,
सुलझाऊँ कैसे कुछ समझ ना पाऊं ,
किसको मीत बनाऊं ,
किसकी प्रीत भुलाऊँ ,
कई बार यूँ भी देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है, मन तोड़ने लगता है।