Sunday, December 21, 2008

चल-चित्र: रोग
स्वर: के के
संगीत: एम एम क्रीम
शब्द: नीलेश मिश्रा , सैयद कादरी

मैंने दिल से कहा ढूंढ लाना खुशी, नासमझ लाया गम तो ये गम ही सही।
बेचारा कहाँ जानता है, खलिश है या क्या खला है,
शहर भर की खुशी से, ये दर्द मेरा भला है,
जश्न ये रास न आए, मजा तो बस गम में आया है।
मैंने दिल से कहा ढूंढ लाना खुशी, नासमझ लाया गम तो ये गम ही सही।
कभी है इश्क का उजाला, कभी है मौत का अँधेरा
बताओ कौन भेस होगा, मैं जोगी बनूँ या लुटेरा,
कई चेहरे हैं इस दिल के न जाने कौन सा मेरा,
मैंने दिल से कहा ढूंढ लाना खुशी, नासमझ लाया गम तो ये गम ही सही।
हजारों ऐसे फासले थे जो तय करने चले थे,
राहें मगर चल पडी थी और पीछे हम रह गए थे,
कदम दो चार चल पाये किए फेरे तेरे मन के,
मैंने दिल से कहा ढूंढ लाना खुशी, नासमझ लाया गम तो ये गम ही सही।

खुला है इस रात में जो, बहकता नूर उसका,

कभी वो एक चेहरा बन के , अगर हो जाए अपना,

ये ही मेरी हकीकत है, मगर अब तक तो है एक सपना,

मैंने दिल से कहा ढूंढ लाना खुशी, नासमझ लाया गम तो ये गम ही सही।

Saturday, December 20, 2008

चल-चित्र: आनंद
स्वर: मुकेश
संगीत: सलील चौधरी
शब्द: योगेश गौड़

कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
सांझ की दुल्हन बदन चुराए चुपके से आए,
मेरे ख्यालों के आँगन में दीप जलाये,
कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए चुपके से आए।

कहीं तो ये दिल कभी मिल नही पाते,
कहीं पे निकल आए जन्मों के नाते,
घनी थी उलझन, प्यासा अपना मन,
अपना ही हो के सहे दर्द पराये।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए चुपके से आए।

दिल जाने मेरे सारे भेद ये गहरे,
हो गए कैसे मेरे सपने सुनहरे,
ये मेरे सपने ये ही तो हैं अपने,
मुझसे न जुदा होंगे इनके ये साये।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए चुपके से आए।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए।

कहीं तो ये दिल कभी मिल नही पाते,
कहीं पे निकल आए जन्मों के नाते,
घनी थी उलझन, प्यासा अपना मन,
अपना ही हो के सहे दर्द पराये।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए चुपके से आए।

दिल जाने मेरे सारे भेद ये गहरे,
हो गए कैसे मेरे सपने सुनहरे,
ये मेरे सपने ये तो ही हैं अपने,
मुझसे न जुदा होंगे इनके ये साये।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए चुपके से आए।

चल-चित्र: आनंद
स्वर: मन्ना डे
संगीत: सलील चौधरी
शब्द: योगेश गौड़


जिंदगी कैसी है पहेली हाय ,
कभी तो हंसाये,
कभी ये रुलाये।

कभी देखो मन नही जागे,
पीछे पीछे सपनों के भागे,
एक दिन सपनों का राही,
चला जाए सपनों से आगे कहाँ?
जिंदगी कैसी है पहेली हाय ,
कभी तो हंसाये, कभी ये रुलाये।

जिन्होंने सजाये यहाँ मेले,
सुख दुःख संग संग झेले,
वही चुन कर खामोशी,
यूँ चले जाए अकेले कहाँ?
जिंदगी कैसी है पहेली हाय ,
कभी तो हंसाये,
कभी ये रुलाये।

चल चित्र: छोटी सी बात (१९७५)
स्वर: मुकेश
संगीत: सलील चौधरी
शब्द: योगेश गौड़
ये दिन क्या आए लगे फूल हंसने,
देखो बसंती बसंती होने लगे मेरे सपने,
ये दिन क्या आए लगे फूल हंसने।
सोने जैसी हो रही हैं हर सुबह मेरी,
लगे हर सांझ अब गुलाल से भरी,
चलने लगी महकी हुयी,
पवन मगन झूम के,
आँचल तेरा चूम के,
ये दिन क्या आए लगे फूल हंसने।
वहाँ मन बावरा आज उड़ चला,
जहाँ पर हैं गगन सलोना सांवला,
जाके वहीं रख दे कहीं,
मन रंगों में खोल के,
सपने ये अनमोल से,
ये दिन क्या आए लगे फूल हंसने,
देखो बसंती बसंती,
होने लगे मेरे सपने,
ये दिन क्या आए लगे फूल हंसने।

चल चित्र : रजनीगंधा (१९७४)
स्वर : मुकेश
संगीत : सलील चौधरी
शब्द : योगेश गौड़

कई बार यूँ भी देखा है,
ये जो मन की सीमा रेखा है,
मन तोड़ने लगता है,
अनजानी प्यास के पीछे ,
अनजानी आस के पीछे ,
मन दौड़ने लगता है,
कई बार यूँ भी देखा है...
राहों में , राहों में, जीवन की राहों में,
जो खिले हैं फूल फूल मुस्करा के ,
कौन सा फूल चुराके ,
रख लूँ मन में सजा के,
कई बार यूँ भी देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है, मन तोड़ने लगता है,
जानूँ ना , जानूँ ना, उलझन ये जानूँ ना ,
सुलझाऊँ कैसे कुछ समझ ना पाऊं ,
किसको मीत बनाऊं ,
किसकी प्रीत भुलाऊँ ,
कई बार यूँ भी देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है, मन तोड़ने लगता है।